Info India News I कोसमी में आदिवासियों के घर टूटे तो भड़के शिवराज, मोहन यादव सरकार पर उठाए सीधे सवाल!
सीहोर, मध्य प्रदेश। मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के बुधनी विधानसभा क्षेत्र के कोसमी गांव में आदिवासी परिवारों के मकान तोड़े जाने का मामला अब प्रदेश की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन गया है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने रविवार, 11 अक्टूबर को प्रभावित परिवारों से मुलाकात की। वहां की स्थिति देखकर उन्होंने अधिकारियों के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई और मुख्य सचिव से फोन पर बात की। इस पूरे घटनाक्रम ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार के सामने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
शिवराज का सीधा सवाल—आखिर गरीब आदिवासियों का कसूर क्या है?
कोसमी गांव में बरेला आदिवासी समुदाय के 12 परिवारों के मकान तोड़े जाने की खबर सामने आई है। प्रभावित परिवारों ने आरोप लगाया कि कार्रवाई के दौरान उनकी फसलें भी नष्ट हुईं और पानी के लिए इस्तेमाल होने वाले कुएं को मिट्टी से भर दिया गया। वन विभाग की ओर से कार्रवाई को कथित अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया बताया गया है, लेकिन सवाल यह है कि ऐसी कार्रवाई के दौरान प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और बुनियादी जरूरतों का ध्यान रखा गया या नहीं?
शिवराज सिंह चौहान ने इस मामले में बेहद तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सवाल उठाया कि जिन आदिवासी परिवारों ने भाजपा को वोट दिया, उन्हीं परिवारों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों हुआ? उन्होंने कहा कि इन लोगों के वोट से भाजपा को जीत मिली और मोहन यादव मुख्यमंत्री बने। ऐसे में गरीब परिवारों के साथ हुई इस कार्रवाई की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। <PRIVATE_PERSON>
शिवराज के इस बयान ने सियासी बहस को और तेज कर दिया है। क्योंकि यह सवाल किसी विपक्षी नेता ने नहीं, बल्कि भाजपा के वरिष्ठ नेता और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री ने अपनी ही पार्टी की सरकार के सामने उठाया है।
मोहन यादव सरकार के सामने तीन बड़े सवाल
पहला सवाल—अगर अधिकारियों को अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई करनी थी, तो क्या प्रभावित परिवारों को पर्याप्त सूचना और वैधानिक प्रक्रिया का पालन करते हुए अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया?
दूसरा सवाल—यदि मकान तोड़ने के साथ फसलों और कुएं को नुकसान पहुंचा है, तो इसकी निष्पक्ष जांच कौन करेगा और प्रभावित परिवारों को राहत कब मिलेगी?
तीसरा और सबसे अहम सवाल—क्या मुख्यमंत्री मोहन यादव इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करेंगे, या फिर मामला जांच और आश्वासनों तक ही सीमित रह जाएगा?
इन सवालों का जवाब प्रदेश की जनता को मिलना चाहिए। किसी भी सरकार के लिए कानून का पालन जरूरी है, लेकिन कानून लागू करने की प्रक्रिया में मानवीय संवेदनशीलता और प्रभावित परिवारों के अधिकारों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।
मुख्य सचिव को फोन, मुख्यमंत्री से चर्चा की बात
शिवराज सिंह चौहान ने घटनास्थल से ही मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल से फोन पर बात की। उन्होंने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल से भी इस विषय पर चर्चा की और मुख्यमंत्री मोहन यादव के सामने पूरा मामला रखने की बात कही।
शिवराज ने प्रभावित परिवारों को भरोसा दिलाया कि उन्हें अकेला नहीं छोड़ा जाएगा। उन्होंने नए मकान बनवाने और स्थायी व्यवस्था होने तक रहने-खाने की सुविधा दिलाने का आश्वासन भी दिया। अब सबसे बड़ी चुनौती इन आश्वासनों को जमीन पर उतारने की है। <PRIVATE_PERSON>
यहां सवाल सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी का नहीं है। जिन परिवारों के सिर से छत छिन गई, उनके लिए तत्काल आवास, भोजन, पानी और बच्चों की सुरक्षा सबसे बड़ी जरूरत है। सरकार को सबसे पहले इन्हीं समस्याओं का समाधान करना चाहिए।
क्या भाजपा के भीतर भी सब कुछ ठीक है?
इस घटनाक्रम ने राजनीतिक हलकों में एक और बहस छेड़ दी है। क्या यह केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला है, या सरकार और संगठन के स्तर पर समन्वय की कमी भी सामने आ रही है? फिलहाल किसी आंतरिक राजनीतिक साजिश की पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए इस संबंध में निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
हालांकि, जब शिवराज सिंह चौहान जैसे वरिष्ठ नेता सार्वजनिक रूप से अधिकारियों की कार्रवाई पर नाराजगी जताते हैं और मुख्यमंत्री तक अपनी बात पहुंचाने की जरूरत महसूस करते हैं, तो सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
Shivraj Singh Chouhan Expresses Anger Over Displacement of Tribal Families, Questions Officials of His Own Government https://t.co/Mi0jTvNvHy
— Bishwajeet Maurya (@bishwamaurya_) October 12, 2026
मुख्यमंत्री मोहन यादव के लिए यह मामला अपनी सरकार की संवेदनशीलता और प्रशासनिक जवाबदेही साबित करने का अवसर भी है। यदि कार्रवाई में नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो जांच के बाद जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए। यदि अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया कानूनी थी, तब भी प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और नुकसान की शिकायतों पर निष्पक्ष निर्णय जरूरी है।
अब मुख्यमंत्री मोहन यादव क्या करेंगे?
कोसमी गांव की घटना ने एक बुनियादी सवाल सामने रखा है—क्या विकास और कानून व्यवस्था के नाम पर गरीब परिवारों की समस्याओं को नजरअंदाज किया जा सकता है? जवाब स्पष्ट है: किसी भी कार्रवाई में कानून और मानवीय गरिमा, दोनों का सम्मान होना चाहिए।
शिवराज सिंह चौहान ने सवाल उठाकर अब जिम्मेदारी मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार पर डाल दी है। जनता यह देखना चाहेगी कि प्रभावित आदिवासी परिवारों को वास्तविक राहत कब मिलती है, नुकसान की जांच कैसे होती है और जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई की जाती है।
फिलहाल कोसमी का मामला मध्य प्रदेश की राजनीति में चर्चा का केंद्र है। शिवराज के तेवरों ने सरकार को असहज जरूर किया है, लेकिन इस विवाद का असली जवाब बयानबाजी से नहीं, बल्कि पीड़ित परिवारों को न्याय और राहत दिलाने से मिलेगा।
सबसे बड़ा सवाल यही है—मुख्यमंत्री मोहन यादव, क्या कोसमी के आदिवासी परिवारों को न्याय मिलेगा, और क्या उनकी छत छीनने के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय होगी?
