Entertainment-मेरा उद्देश्य केवल कृष्ण की पूजा नहीं

Info India News I मेरा उद्देश्य केवल कृष्ण की पूजा नहीं, बल्कि दर्शकों के भीतर कृष्ण के विचार और चेतना का अनुभव जगाना है — राजीव सिंह दिनकर(निर्देशक मेरे कृष्ण नाटक)
लोकप्रिय लाइव नाट्य प्रस्तुति “मेरे कृष्ण” के निर्देशक एवं रंगमंच-फिल्म निर्देशक राजीव सिंह दिनकर का मानना है कि इस नाटक का उद्देश्य केवल भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि दर्शकों के भीतर कृष्ण के विचार, दर्शन और चेतना का अनुभव जगाना है। उनके अनुसार यह प्रस्तुति दर्शकों को आत्मचिंतन और जीवन मूल्यों से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है।
डॉ. नरेश कात्यायन द्वारा लिखित हिंदी पौराणिक नाटक “मेरे कृष्ण” भगवान श्रीकृष्ण की वृंदावन से द्वारका तक की जीवन यात्रा को 20 जीवंत दृश्यों में प्रस्तुत करता है। लगभग पौने तीन घंटे की इस भव्य प्रस्तुति में रंगमंच, संगीत, नृत्य और मल्टीमीडिया का प्रभावशाली संगम देखने को मिलता है। नाटक में सौरभ राज जैन श्रीकृष्ण, पूजा बी. शर्मा राधा एवं महामाया तथा अर्पित रांका दुर्योधन और कंस की भूमिका निभा रहे हैं।

राजीव सिंह दिनकर ने बताया कि उनकी रंगमंचीय यात्रा से ही निर्देशन की शुरुआत हुई और बाद में उन्होंने फिल्म जगत में सहायक एवं सह-निर्देशक के रूप में “प्रणाम”, “भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया” और “कुरुक्षेत्र” जैसी फिल्मों में कार्य किया। उनका कहना है कि बड़े कैनवास पर काम करने का अनुभव “मेरे कृष्ण” जैसे विशाल मंचीय प्रोजेक्ट को साकार करने में बेहद उपयोगी साबित हुआ।

उन्होंने बताया कि इस नाटक की मूल परिकल्पना लेखक डॉ. नरेश कात्यायन की लेखनी से जन्मी। इसके बाद विवेक गुप्ता और विष्णु पाटिल के साथ मिलकर इसे एक ऐसे मंचीय अनुभव के रूप में विकसित किया गया, जिसमें रंगमंच, संगीत, नृत्य और आधुनिक मल्टीमीडिया तकनीक का संतुलित समावेश हो।

दिनकर के अनुसार “मेरे कृष्ण” केवल श्रीकृष्ण के जीवन की प्रसिद्ध घटनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें शिशुपाल के प्रति उनकी करुणा, कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान उनका आंतरिक द्वंद्व, कूटनीतिक दृष्टि और ब्रह्मांडीय चेतना जैसे कम चर्चित प्रसंगों को भी प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया है। नाटक में महामाया का पात्र सूत्रधार के रूप में पूरी कथा को जोड़ता है।

कलाकारों के चयन पर उन्होंने कहा कि सौरभ राज जैन ने श्रीकृष्ण के चरित्र को सहजता, गरिमा और आध्यात्मिक भाव के साथ जीवंत किया है। वहीं पूजा बी. शर्मा राधा और महामाया जैसी दो बिल्कुल अलग भूमिकाओं में प्रभावशाली दिखाई देती हैं, जबकि अर्पित रांका ने दुर्योधन और कंस जैसे जटिल पात्रों को गहराई से मंच पर उतारा है।

नाटक की प्रस्तुति शैली पर उन्होंने कहा कि यह काव्यात्मक होने के साथ-साथ आधुनिक भी है। इसमें दार्शनिक विचारों को मनोरंजक मंचीय भाषा, प्रकाश, ध्वनि और दृश्य प्रभावों के माध्यम से दर्शकों तक पहुँचाया गया है, जिससे हर दृश्य एक भावनात्मक अनुभव बन जाता है।

उन्होंने बताया कि संगीतकार उद्भव ओझा का मौलिक संगीत और गायक शान की आवाज़ इस प्रस्तुति की आत्मा हैं। संगीत, नृत्य और मल्टीमीडिया का समन्वय दर्शकों को केवल कथा सुनने तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उन्हें पूरी तरह उस अनुभव का हिस्सा बना देता है।

राजीव सिंह दिनकर ने कहा, “हमारा उद्देश्य केवल रीति-रिवाज़ आधारित पूजा-भाव जगाना नहीं है, बल्कि जागरूकता, चिंतन और आत्म-जागरण को बढ़ावा देना है। हम चाहते हैं कि दर्शक श्रीकृष्ण को केवल एक दैवीय स्वरूप के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे दार्शनिक मार्गदर्शक के रूप में देखें, जिनकी शिक्षाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। मेरा उद्देश्य केवल कृष्ण की पूजा नहीं, बल्कि दर्शकों के भीतर कृष्ण के विचार और चेतना का अनुभव जगाना है।”